- BHIVE Unveils Its First-Ever Brand Film with Milind Soman, Turning Its Campus Workplace Vision into a Movement
- नेशनल अवॉर्ड विनर अंजलि पाटिल की ‘सेल्वी’ ने बुसान प्रीमियर से पहले जारी किया नया पोस्टर
- पूजा बत्रा, अदिति गोवित्रिकर और दीपक तिजोरी ने योगासन चैंपियनशिप में जमाया रंग, फिटनेस को लेकर दिया खास संदेश
- A Soulful Farewell to Bappa: Nirvaan Birla Presents His Rendition of ‘Jai Ganesha Deva’
- Krishna das joins amjad ali khan’s chants for unity for a powerful rendition of om mani padme hum
मोबाइल का बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों के व्यवहार और बुजुर्गों की स्मृति को कर सकता है प्रभावित: प्रो. डॉ. एके द्विवेदी
वर्कशॉप में होम्योपैथी के छात्रों ने पोस्टर द्वारा बताया अल्जाइमर और ऑटिज्म का अंतर; डॉ. द्विवेदी ने स्वस्थ जीवनशैली में होम्योपैथी चिकित्सा के सकारात्मक दृष्टिकोण को समझाया
इंदौर। एसकेआरपी गुजराती होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज, इंदौर के ह्यूमन फिजियोलॉजी एवं बायोकेमिस्ट्री विभाग द्वारा “क्लिनिकल फिजियोलॉजी एवं क्लिनिकल प्रैक्टिस को बेहतर बनाने में ह्यूमन फिजियोलॉजी का महत्व” विषय पर दो दिवसीय वर्कशॉप आयोजित की जा रही है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने की। प्रथम दिवस के मुख्य अतिथि साओ पाउलो, ब्राजील से श्री एडसन एवं वाडेहया रहे।
21 सितंबर, विश्व अल्जाइमर दिवस के अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. एके द्विवेदी ने विद्यार्थियों को अल्जाइमर, ऑटिज्म एवं एडीएचडी जैसी स्थितियों के बारे में जानकारी देते हुए इनके बीच का अंतर समझाया। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बच्चों और बुजुर्गों के लिए संतुलित स्क्रीन टाइम, पारिवारिक संवाद, पर्याप्त नींद और सक्रिय जीवनशैली बेहद महत्वपूर्ण हैं।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि “मोबाइल हमारा साधन है, जीवन का विकल्प नहीं।” बच्चों को केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित रखने के बजाय खेल, पढ़ाई, रचनात्मक गतिविधियों, प्रकृति और परिवार के साथ संवाद के अवसर देने चाहिए। उन्होंने बुजुर्गों को भी सामाजिक रूप से सक्रिय रखने और परिवार के साथ समय बिताने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग कुछ बच्चों में नींद, व्यवहार और दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन ऑटिज्म या एडीएचडी को केवल मोबाइल फोन के उपयोग का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। इसी प्रकार, बुजुर्गों में भूलने की समस्या के पीछे उम्र, नींद, तनाव और अन्य चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं। लगातार समस्या होने पर विशेषज्ञ चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है।
प्रो. डॉ. द्विवेदी ने विद्यार्थियों को बताया कि होम्योपैथी में रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों और समग्र स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर उपचार का दृष्टिकोण अपनाया जाता है। उन्होंने कहा कि ऑटिज्म और अल्जाइमर जैसे जटिल मामलों में होम्योपैथिक चिकित्सा को लेकर व्यक्तिगत चिकित्सकीय अनुभव सामने आए हैं।
उन्होंने अपने चिकित्सकीय अनुभव का एक उदाहरण साझा करते हुए बताया कि एक 7 वर्षीय बच्चे में लगभग एक वर्ष के होम्योपैथी उपचार और निरंतर फॉलो-अप के दौरान परिवार ने पहले की तुलना में आंखों से संपर्क, संवाद और सामाजिक सहभागिता में सकारात्मक बदलाव महसूस किया।
ऑटिज्म से जूझ रहे 7 वर्षीय बच्चे में होम्योपैथी उपचार के दौरान संवाद और सामाजिक व्यवहार में उल्लेखनीय सुधार
इंदौर के 7 वर्षीय बच्चे में उपचार के दौरान धीरे-धीरे आई कॉन्टैक्ट, संवाद और सामाजिक व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। 4–5 माह में आई कॉन्टैक्ट विकसित हुआ और 7–8 माह बाद बच्चे ने पहली बार “मां” कहा। सितंबर 2026 में क्लिनिक पहुंचकर बच्चे ने डॉक्टर को “नमस्कार” किया। परिजनों के अनुसार अब बच्चा पूरे वाक्यों में बात कर रहा है तथा ड्राइंग, पेंटिंग और लिखने में भी रुचि ले रहा है।
डॉ. द्विवेदी का यह अनुभव ऑटिज्म से जुड़े बच्चों में समय पर पहचान, निरंतर उपचार, थेरेपी/सहयोग और परिवार की सक्रिय भागीदारी के महत्व को रेखांकित करता है। उन्होंने विद्यार्थियों को विशेष रूप से समझाया कि ऐसे बच्चों में होम्योपैथी चिकित्सा से किस तरह प्रभावी संचार एवं अन्य कौशलों में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में बीएचएमएस प्रथम वर्ष की छात्रा रविना बामनका ने अल्जाइमर तथा कीर्ति प्रजापत ने ऑटिज्म विषय पर पोस्टर प्रस्तुत किए। विद्यार्थियों ने पोस्टर के माध्यम से दोनों स्थितियों के लक्षण, जागरूकता, देखभाल और समाज में संवेदनशीलता की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
प्रो. डॉ. द्विवेदी ने कहा कि होम्योपैथी चिकित्सक की भूमिका केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में स्वास्थ्य जागरूकता, सकारात्मक सोच और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों को वैज्ञानिक सोच, निरंतर अध्ययन, मरीज के प्रति संवेदनशीलता और क्लिनिकल कौशल विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि हर बच्चा अनोखा है और उसकी अपनी विशेष क्षमताएं एवं संभावनाएं हैं। ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें संवाद, सामाजिक व्यवहार, संवेदनशीलता और सीखने के तरीके अलग हो सकते हैं। होम्योपैथी में उपचार बच्चे के व्यक्तिगत लक्षणों और समग्र प्रकृति के आधार पर किया जाता है।
दो दिवसीय वर्कशॉप में क्लिनिकल फिजियोलॉजी, संकेतों एवं लक्षणों के फिजियोलॉजिकल आधार, जांचों की समझ, केस आधारित चर्चा, डेमोंस्ट्रेशन तथा क्लिनिकल सोच पर विशेष सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य BHMS विद्यार्थियों को फिजियोलॉजी के मूल सिद्धांतों को वास्तविक क्लिनिकल परिस्थितियों से जोड़ना है।
वर्कशॉप का समापन 22 सितंबर 2026 को होगा। समापन समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. अजय भट्ट, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, फिजियोलॉजी, एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर होंगे।
प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने फिजियोलॉजी विभाग की सराहना करते हुए कहा कि इसका लाभ छात्रों को जीवनपर्यंत याद रहेगा। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं सभी विभागों को आयोजित करनी चाहिए। उन्होंने विभाग के सभी प्राध्यापकों की भी सराहना की।


